ढूंढ रही थी खुद को मैं… (Self Discovery Poem in Hindi)

ढूंढ रही थी खुद को मैं …
हर अपने में…
हर रिश्ते में…
हर टूटे हुए सपने में…

हर उस जिम्मेदारी के बीच,
जिसके नीचे दफ़न पड़ी थी मैं…
हर उस झूठी मुस्कान में भी,
जो रोज़ जीती थी मैं…

उस नन्ही सी जान के मुस्कुराहट में भी
जिसमें मेरी पूरी दुनिया बसती है…
जिसके लिए मैं हर दिन जीती हूँ…

और उन शब्दों के शोर में भी,
जहाँ बार-बार सुनने को मिलता है—
“तुम्हें तो कुछ आता ही नहीं…”
“तुम कुछ नहीं समझती”

उन डिग्रियों के पीछे भी,
जो कभी मेरी पहचान हुआ करती थीं…
उन नौकरियों के बीच भी,
जो सुरक्षित भी थीं, सम्मानित भी…
पर शायद मेरी नहीं थीं…

मैं हर जगह गई…
हर तरफ खुद को तलाशा…
पर हर बार जैसे खुद से दूर ही होती गई…

फिर एक दिन…
चुपचाप बैठी थी मैं,
सुबह की हल्की-सी बारिश के साथ…
बिल्कुल अकेली…
शांत…
कुछ लिखती हुई…

और तभी…
मिल गई मैं खुद से—
“यहीं तो थी मैं…”

आसान नहीं था ये पाना…
रोज़ खुद से लड़ना,
हर पल लोगों की नज़रों से गुजरना…
और ये सुनना—
“कोई नौकरी छोड़कर ये सब करता है?”
“बच्चों को पढ़ाने की उम्र में, खुद पढ़ता है?”

पर सच बताऊँ…
अब फर्क नहीं पड़ता मुझे…
क्योंकि ढूंढ लिया है मैंने खुद को,
उसी भीड़ में, जहाँ मैं खो गई थी…

और अब…
मैं अकेले खुश हूँ …
क्योंकि अब मैं अपनी ही सहेली हूँ… 💛

और यहीं हुई शुरुआत…

और यहीं हुई शुरुआत मेरी,
मेरे उस सफर की…

मेरे जैसे कुछ और भी हैं…
जो खो गए हैं,
उन्हें भी ढूंढ लाना है…

जिनको सुना नहीं किसी ने,
उनके लिए भी तो राह बनानी है…

सुनो ज़िन्दगी की नींव रखी…

और जुड़ रही हूँ अब मैं…

और जुड़ रही हूँ अब मैं,
अपनों के साथ…
अपने ही जैसे लोगों की मदद करने…

ढूंढ निकालने उन आवाज़ों को,
जो दब गईं…
उन सपनों को,
जो खो गए…

उन आहों को,
जो सुनी नहीं किसी ने…
उन राहों को,
जो समाज के डर से
कभी चली ही नहीं गईं…

✍️ Written by Dimple Singh

About This Poem

यह खुद को ढूंढने की हिंदी कविता उन सभी महिलाओं और introverts के लिए है जो अपनी पहचान खो चुकी हैं और फिर से खुद से जुड़ना चाहती हैं। यह कविता self-love, self-discovery और inner healing की journey को दर्शाती है।

💛 अगर यह कविता आपके दिल को छू गई हो,
तो आप भी अपनी कहानी share कर सकते हैं…

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